उठ उठ री लघु लघु लोल लहर!करुणा की नव अँगराई-सी,मलयानिल की परछाईं-सी,इस सूखे तट पर छिटक छहर!शीतल कोमल चिर कंपन-सी,दुर्ललित हठीले बचपन-सी,तू लौट कहाँ जाती है री-यह खेल खेल ले ठहर ठहर!उठ-उठ गिर-गिर फिर-फिर आती,नर्त्तित पद-चिह्न बना जाती,सिकता की रेखाएँ उभार-भर जाती अपनी तरल-सिहर !तू भूल न री, पंकज वन मेंजीवन के इस सूनेपन में,ओ प्यार-पुलक से भरी ढुलक!आ चूम पुलिन के विरस अधर !

उठ उठ री लघु लघु लोल लहर!
जयशंकर प्रसादकविता · लगभग २ मिनट