निज अलकों के अन्धकार में तुम कैसे छिप आओगे?इतना सजग कुतूहल ! ठहरो, यह न कभी बन पाओगे!आह, चूम लूँ जिन चरणों को चाँप-चाँप कर उन्हें नहीं-दुख दो इतना, अरे अरुणिमा ऊषा-सी वह उधर बही ।वसुधा चरण-चिह्न-सी बन कर यहीं पड़ी रह जावेगी।प्राची रज ‘कुंकुम ले चाहे अपना भाल सजावेगी।देख न लूँ, इतनी ही तो है इच्छा? लो सिर झुका हुआ ।कोमल किरन-उँगलियों से ढँक दोगे यह दृग खुला हुआ।फिर कह दोगे; पहचानो तो मैं हूँ कौन बताओ तो ।किंतु उन्हीं अधरों से, पहले उनकी हँसी दबाओ तो ।सिहर भरे निज शिथिल मृदुल अंचल को अधरों से पकड़ो।बेला बीत चली है चंचल बाहु-लता से आ जकड़ो।तुम हो कौन और मैं क्या हूँइसमें क्या है धरा, सुनो -मानस जलधि रहे चिर चुंबित -मेरे क्षितिज उदार बनो।

