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अग्नि न दहै पवन नहीं गमनै तस्कर नेरि न आवै

पद · लगभग २ मिनट
अग्नि न दहै पवन नहीं गमनै तस्कर नेरि न आवै।राम नाम धन करि संचौनी सो धन कतही न जावै॥हमारा धन माधव गोबिंद धरनधर इहै सार धन कहियै।जो सुख प्रभु गोबिंद की सेवा सो सुख राज न लहियै॥इसु धन कारण सिव सनकादिक खोजत भये उदासी।मन मुकुंद जिह्ना नारायण परै न जम की फाँसी॥निज धन ज्ञान भगति गुरु दीनी तासु सुमति मन लागी।जलत अंग थंभि मन धावत भरम बंधन भौ भागी॥कहै कबीर मदन के माते हिरदै देखु बिचारी।तुम घर लाख कोटि अस्व हस्ती हम घर एक मुरारी॥3॥

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