अचरज एक सुनहु रे पंडिया अब किछु कहन न जाई।सुर नर गन गंध्रब जिन मोहे त्रिभुवन मेखलि लाई।राजा राम अनहद किंगुरी बाजै जाकी दृष्टि नाद लव लागै॥भाठी गगन सिडिया अरु चूंडिया कनक कलस इक पाया॥तिस महि धार चुए अति निर्मल रस महि रस न चुआया।एक जु बात अनूप बनी है पवन पियाला साजिया॥तीन भवन महि एको जागी कहहु कवन है राजा॥ऐसे ज्ञान प्रगट्या पुरुषोत्तम कहु कबीर रंगराता।और दुनी सब भरमि भुलाना मन राम रसाइन माता॥4॥

