जगत गुर अनहद कींगरी बाजे, तहाँ दीरघ नाद ल्यौ लागे॥ टेक॥त्री अस्यान अंतर मृगछाला, गगन मंडल सींगी बाजे॥तहुँआँ एक दुकाँन रच्यो हैं, निराकार ब्रत साजे॥गगन ही माठी सींगी करि चुंगी, कनक कलस एक पावा।तहुँवा चबे अमृत रस नीझर, रस ही मैं रस चुवावा॥अब तौ एक अनूपम बात भई, पवन पियाला साजा।तीनि भवन मैं एकै जोगी, कहौ कहाँ बसै राजा॥बिनरे जानि परणऊँ परसोतम, कहि कबीर रँगि राता।यहु दुनिया काँई भ्रमि भुलाँनी, मैं राम रसाइन माता॥153॥

