ऐसा ग्यान बिचारि लै लै, लाइ लै ध्याँनाँ।सुंनि मंडल मैं घर किया, जैसे रहै सिंचाँनाँ॥ टेक॥उलटि पवन कह्याँ राखिये, कोई भरम बिचारै।साँधै तीर पताल कूँ, फिरि गगनहि मारै॥कंसा नाद बजाव ले, धुंनि निमसि ले कंसा॥कंसा फूटा पंडिता, धंुनि कहाँ निवासा॥प्यंड परे जीव कहाँ रहै, कोई मरम लखावै।जीवत जिस घरि जाइये, ऊँचे मुषि नहीं आवै॥सतगुर मिलै त पाइयै, ऐसी अकथ कहाँणीं।कहै कबीर संसा गया, मिले सारंगपाँणीं॥154॥

ऐसा ग्यान बिचारि लै लै, लाइ लै ध्याँनाँ
कबीरपद · लगभग २ मिनट