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हाशिया
कविता
सुन्दर यौं ही बकि उठै, बोलै नहीं बिचारि
सुंदरदास
दोहा · लगभग २ मिनट
सुन्दर यौं ही बकि उठै, बोलै नहीं बिचारि।
सबही कौं लागै बुरौ, देत ढीम सौ डारि॥
॥
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काम क्रोध जिनि कै नहीं, लोभ मोह पुनि नांहिं
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सुन्दर कबहूँ न धीजिये, सरस दुष्ट की बात
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