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मेरो कह्यो सुनि पुनि भावै तोहि करि सो

पद · लगभग २ मिनट
मेरो कह्यो सुनि पुनि भावै तोहि करि सो।चारिहू बिलोचन बिलोकु तू तिलोक महँ,तेरो तिहु काल कहु को है हितू हरि-सो ॥ १ ॥नये-नये नेह अनुभये देह-गेह बसि,परखे प्रंपंची प्रेम, परत उघरि सो।सुहृद-समाज दगाबाजिहीको सौदा-सूत,जब जाको काज तब मिलै पाँय परि सो ॥ २ ॥बिबुध सयाने, पहिचाने कैधौं नाहीं नीके,देत एक गुन, लेत कोटि गुन भरि सो।करम-धरम श्रम-फल रघुबर बिनु,राखको सो होम है, ऊसर कैसो बरिसो ॥ ३ ॥आदि-अंत-बीच भलो भलो करै सबहीको,जाको जस लोक-बेद रह्यो है बगरि-सो।सीतापति सारिखो न साहिब सील-निधान,कैसे कल परै सठ! बैठो सो बिसरि-सो ॥ ४ ॥जीवको जीवन-प्रान, प्रानको परम हित,प्रीतम, पुनीतकृत नीचन निदरि सो।तुलसी! तोको कृपालु जो कियो कोसलपालु,चित्रकूटको चरित्र चेतु चित करि सो ॥ ५ ॥

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