तन सुचि, मनरुचि, मुख कहौं ‘जन हौं सिय-पीको’।केहि अभाग जान्यो नहिं, जो न होइ नाथ सों नातो-नेह न नीको ॥ १ ॥जल चाहत पावक लहौं, बिष होत अमीको।कलि-कुचाल संतनि कही सोइ सही, मोहि कछु फहम न तरनि तमीको ॥ २ ॥जानि अंध अंजन कहै बन-बाघिनी-घीको।सुनि उपचार बिकारको सुबिचार करौं जब, तब बुधि बल हरै हीको ॥ ३ ॥प्रभु सों कहत सकुचात हौं, परौं जनि फिरि फीको।निकट बोलि, बलि, बरजिये, परिहरै ख्याल अब तुलसिदास जड़ जीको ॥ ४ ॥

तन सुचि, मनरुचि, मुख कहौं ‘जन हौं सिय-पीको’
तुलसीदासपद · लगभग २ मिनट