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मन पतंग चेते नहीं अंजुरी समांन

पद · लगभग २ मिनट
मन पतंग चेते नहीं अंजुरी समांन।बिषिया लागि बिगूचिये दाझिये निदांन॥ टेक॥काहे नैन अनिदियै सूझत, नहीं आगि।जनम अमोलिक खोइयै, सांपनि संगि लागि।कहै कबीर चित चंचला, गुर ग्यांन कह्यौ समझाइ॥भगति हीन न जरई जरै, भावै तहाँ जाइ॥368॥

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