मन बनजारा जागि न सोई लाहे कारनि मूल न खोई॥ टेक॥लाहा देखि कहा गरबांना, गरब न कीजै मूरखि अयांनां।जिन धन संच्या सो पछितांनां, साथी चलि गये हम भी जाँनाँ॥निसि अँधियारी जागहु बंदे, छिटकन लागे सबही संधे।किसका बँधू किसकी जोई, चल्या अकेला संगि न कोई।एरि गए मंदिर टूटे बंसा, सूके सरवर उड़ि गये हंसा।पंच पदारथ भरिहै खेहा, जरि बरि जायगी कंचन देहा॥कहत कबीर सुनहु रे लोई, राम नाम बिन और न कोई॥367॥

मन बनजारा जागि न सोई लाहे कारनि मूल न खोई
कबीरपद · लगभग २ मिनट