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हाशिया
कविता
हरि रसपीया जांणिये, जे कबहूँ न जाइ खुमार
कबीर
साखी · लगभग २ मिनट
हरि रसपीया जांणिये, जे कबहूँ न जाइ खुमार।
मैमंता घूमत रहै, नांही तन की सार॥४॥
॥
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कबीर
कविता
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कबीर
कविता
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कबीर
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कबीर
कविता
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कबीर
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