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हरि रसपीया जांणिये, जे कबहूँ न जाइ खुमार

साखी · लगभग २ मिनट
हरि रसपीया जांणिये, जे कबहूँ न जाइ खुमार।मैमंता घूमत रहै, नांही तन की सार॥४॥

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