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हाशिया
कविता
हदे छाँडि बेहदि गया,हुआ निरंतर बास
कबीर
साखी · लगभग २ मिनट
हदे छाँडि बेहदि गया, हुआ निरंतर बास।
केवल ज फूल्या फूल बिन, को निरपै निज दास॥५॥
॥
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हँसै न बोलै उन्मनी चंचल मेहल्या मारि
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हरि रसपीया जांणिये, जे कबहूँ न जाइ खुमार
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कबीर
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