कैसे रचौं पिय पास विलास ‘कुमार’ हुलासनि को सुख लूटै।रूप अनूपम देख्यौ चहौं सखि! संग को नेह नहीं हिय टूटै।मान को मोचन मोहन देखत लोचन को तो संकोच न छूटै।कौन इलाज करौ इहि लाज को जोबिन काज मनोरथ खूटै॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
जनम गंवायो वादि, जन तू सवादि विषकुमारमणि भट्टकविताजनम गंवायो वादि, जन तू सवादि विषकुमारमणि भट्ट२ मिनट का पाठ