नाहिने और है ठौर अहै जन मूढ़ कठोर सबै है इहाँ हीं।जाने न जे पर स्वारथ हेत, निकेत तजै, बसि खेत सदा हीं।पावस-पंथिय मीत! निवास को पास न गाँव है जाव जहाँ हीं।ऊँचे उठे नभ देखि पयोधर जो बसि हौ तो बसौ घर याँही॥

नाहिनै और है ठौर अहै जन मूढ
कुमारमणि भट्टसवैया · लगभग २ मिनट