गोपिन को मीत, सुर-नर-नाग-गीत,गुन-गननि प्रतीत, पीतपट कटि धारे हैं।मंजुल मुकुट, कंध कामरी, लकुट कर,वन भटकत, नट-वेष को सु धारे हैं॥बच्छन को चारक उचारक निगम को,‘कुमार’ परिचारक के काजहि सम्हारे हैं।एकै मतिधारी लोक-वेद-निरधारी न्यान,गिरिवरधारी, कान्ह ठाकुर हमारे हैं॥

गोपिन को मीत, सुर-नर-नाग-गीत
कुमारमणि भट्टकवित्त · लगभग २ मिनट