भोर निहारत भामिन की छबिकुमारमणि भट्टकविताभोर निहारत भामिन की छबि
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२१ रचनाएँ

भोर निहारत भामिन की छबिकुमारमणि भट्टकविता
आनि अचानक आनन मेंकुमारमणि भट्टकविता
देखि हौं जू इक गौप-सुता छबिकुमारमणि भट्टकविता
केलि कै रंग रची रति दूसरैकुमारमणि भट्टकविता
कांति मनोहर मोहन की दृगकुमारमणि भट्टकविता
राम नरिंद तिहारे पयानकुमारमणि भट्टकविता
मीत पुरातन बाम्हन दीन कोंकुमारमणि भट्टकविता
लूट्यौ सौ गेह, घनौ बरसै घनकुमारमणि भट्टकविता
दोऊ मिले रस के बस बातनिकुमारमणि भट्टकविता
हौ तो घरी घर तें इत भोरहिकुमारमणि भट्टकविता
जानै कहा? नवला अबलाकुमारमणि भट्टकविता
खोली तनी कितनी विनती सोंकुमारमणि भट्टकविता
खेलत कान्ह कदंब चढे लखिकुमारमणि भट्टकविता
खौर को राग छुट्यौ कुच कोकुमारमणि भट्टकविता
पाइनि मंद गयंदन की गतिकुमारमणि भट्टकविता
छोटो सौ वेश अपूरव पेखतकुमारमणि भट्टकविता
कैसे रचौं पिय पास विलासकुमारमणि भट्टकविता
नाहिनै और है ठौर अहै जन मूढकुमारमणि भट्टकविता
गोपिन को मीत, सुर-नर-नाग-गीतकुमारमणि भट्टकविता
जनम गंवायो वादि, जन तू सवादि विषकुमारमणि भट्टकविता
भाग जसुधा को, वसुधा का आभरन पूरौकुमारमणि भट्टकविता