भोर निहारत भामिन की छबि, डीठि लगी गहि एकटकी है।द्वार लौं आइ हरैं पग धारि ‘कुमार’ निहारिये हारि जकी है।प्रीतम-संग में, प्रेम-उमंग में, केलि के रंग में, जागि छकी है।आधे रहे कहे आनन बैन हैं, नैन हैं कातर, गात थकी है॥

भोर निहारत भामिन की छबि
कुमारमणि भट्टसवैया · लगभग २ मिनट