ताकूँ रे कहा कीजै भाई,तजि अंमृत बिषै सूँ ल्यौ लाई॥ टेक॥बिष संग्रह कहा सुख पाया,रंचक सुख कौ जनम गँवाया॥मन बरजै चित कह्यो न करई,सकति सनेह दीपक मैं परई॥कहत कबीर मोहि भगति उमाहा,कृत करणी जाति भया जुलाहा॥271॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
हिंदू तुरक कहाँ ते आये किन एह राह चलाईकबीरकविताहिंदू तुरक कहाँ ते आये किन एह राह चलाईकबीर२ मिनट का पाठ