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कछु ह्वे न आई गयो जनम जाय

पद · लगभग २ मिनट
कछु ह्वे न आई गयो जनम जाय।अति दुरलभ तनु पाइ कपट तजि भजे न राम मन बचन- काय ॥ १ ॥लरिकाई बीती अचेत चित, चंचलता चौगुने चाय।जोबन-जुर जुबती कुपथ्य करि, भयो त्रिदोष भरि मदन बाय ॥ २ ॥मध्य बयस धन हेतु गँवाई, कृषी बनिज नाना उपाय।राम-बिमुख सुख लह्यो न सपनेहुँ, निसिबासर तयौ तिहूँ ताय ॥ ३ ॥सेये नहिं सीतापति-सेवक, साधु सुमति भलि भगति भाय।सुने न पुलकि तनु, कहे न मुदित मन किये जे चरित रघुबंसराय ॥ ४ ॥अब सोचत मनि बिनु भुअंग ज्यो, बिकल अंग दले जरा धाय।सिर धुनि-धुनि पछिताय मींजि कर कोउ न मीत हित दुसह दाय ॥ ५ ॥जिन्ह लगि निज परलोक बिगार् यौ, ते लजात होत ठाढ़े ठाँय।तुलसी अजहुँ सुमिरि रघुनाथहिं, तर् यौ गयँद जाके एक नाँय ॥ ६ ॥

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