ओप भरे हैं कछू उभरे हैं करी बिधि आपने हाथ सँवारे।गोकुल रोमवली सों खिले अलि की अवलीन को हैं प्रनधारे।चारु सुगंध सने सुखमा सुचि रंग-रँगे सुकुमारता भारे।कौल-कलीन के हार मिले न लली लखि जात उरोज तिहारे॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
पंकज से पानि पाय चंद्रमा सो चारु मुखगोकुलनाथकवितापंकज से पानि पाय चंद्रमा सो चारु मुखगोकुलनाथ२ मिनट का पाठ