पियरी पगिया पर मोरपखा गति वायु लगें चल भावत है।परि गोधरनेनु रहौ मुख पै बढ़ि खेदकनों छबि छावत है।करि गाइन गोकुल आगे हरे हरें बाँसुरी मंद बजावत है।इत आइ लखौ वह कारो अहीर को कालिंदी कूल तें आवत है॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+