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ऊधो! या ब्रज की दसा बिचारौ

पद · लगभग २ मिनट
ऊधो! या ब्रज की दसा बिचारौ।ता पाछे यह सिद्धि आपनी जोग कथा बिस्तारौ ।। 1 ।।जा कारन पठए तुम माधव, सो सोचहु मन माहीं।कोतिक बीच बिरह परमारथ, जानत हौ किधौं नाहीं ।। 2 ।।परम चतुर निज दास स्याम के, संतत निकट रहत हौ।जल बूड़त अवलंब फेन कौ फिरि-फिरि कहा कहत हौ? ।। 3 ।।वह अति ललित मनोहर आनन कौने जतन बिसारौं।जोग जुगुमि अरू मुकुति बिबिध बिधि वा मुरली पर वारौं ।। 4 ।।जेहिं उस बसत स्यामसुंदर घन, तेहिं निर्गुन कस आवैं।तुलसिदास सो भजन बहावौ, जाहि दूसरो भावै ।। 5 ।।

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