दक्षिन में जिन्है देखि लक्षन में देखियत,लक्षन सो अक्षन में स्वच्छ निरधारि कै।ते वैं अनकूल भये आनंद अतूल छए,छोड़ि है नवेली मनमैली ते बिसारि कै॥गोकुल कहत रूप रंग रस बस महा,छोह सों छए हैं भूली गति मति हारि कै।प्यारे के बसत चख चंचरीक आठों जाम,तेके मुख पंकज में पंकज बिचारि कै॥

दक्षिन में जिन्है देखि लक्षन में देखियत
गोकुलनाथकवित्त · लगभग २ मिनट