कौण भाँति भल मानै गुसाईं।तुम भावै सो मैं जानत नाहीं॥कै भल मानै नाचै गायें।कै भल मानै लोक रिझायें॥के भल मानै तीरथ न्हायें।कै भल मानै मूँड मुड़ायें॥कै भल मानै सब घर त्यागी।कै भल मानै भय बैरागी॥कै भल मानै जटा बधायैं।कै भल मानै भसम लगायें॥कै भल मानै न बन-बन डोलैं।कै भल मानै मुखहिं न बोलें॥कै भल मानै जप-तप कीयें।कै भल मानै करवत लीयें॥कै भल मानै ब्रह्म गियानी।कै भल मानै अधिक धियानी॥जे तुम भावै सो तुम्ह पै आहि।दादू न जाणै कहि समझाइ॥

