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अवधू नादैं व्यंद गगन गाज सबद अनहद बोलै

पद · लगभग २ मिनट
अवधू नादैं व्यंद गगन गाज सबद अनहद बोलै।अंतरि गति नहीं देखै नेड़ा, ढूंढ़त बन बन डोलै॥ टेक॥सालिगराम तजौं सिव पूजौं, सिर ब्रह्मा का काटौं।सायर फोड़ि नीर मुलकाऊँ, कुंवाँ सिला दे पाटौं॥चंद सूर दोइ तूँबा करिहूँ, चित चेतिनि की डाँड़ी।सुषमन तंती बाजड़ लागी, इहि बिधि त्रिष्णाँ षाँडी॥परम तत आधारी मेरे सिव नगरी धर मेरा।कालहि षंडूँ नीच बिहंडूँ, बहुरि न करिहूँ फेरा॥जपौं न जाप हतौं नहीं गूगल पुस्तक ले न पढ़ाऊँ।कहै कबीर परम पद पाया, नहीं आऊँ नहीं जाऊँ॥196॥

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