तब तौ छबि पीवत जीवत हे, अब सोचन लोचन जात जरे।हित पोष के तोष सु प्रान पले, बिललात महा दु:ख दोष भरे॥घनआनंद मीत सुजान बिना सब ही सुख-साज-समाज टरे।तब हार पहार से लागत हे अब आनि कै बीच पहार परे॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+