सुन्दर शिष जिज्ञास ह्वै, शब्द ग्रहै मन लाइ।तासौं सद्गुरु तुरत ही, ज्ञान कहै संमुझाइ॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
प्रात ही उठत सब पेट ही की चिंता सबसुंदरदासकविताप्रात ही उठत सब पेट ही की चिंता सबसुंदरदास२ मिनट का पाठ