फूलि रही सरसों चहुँ ओर, ज्यों सोने के बेस बिछायत साँचें।चीर सजे नर-नारिन पीत, बढ़ी रसरीति, बरंगना नाँचें।त्यों कवि ‘ग्वाल’ रसाल के बौरन, भौंरन-झौंरन ऊधम माँचें।काम गुरु भयो, फाग सुरु भयो, खेलियें आज बसंत की पाँचें॥

फूलि रही सरसों चहुँ ओर
ग्वालसवैया · लगभग २ मिनट