पाइन पीडुरी जंघ नितंब भरी बिधि लंक लोनाई हितै कै।नाभिथली बलि रोमवली कुच कुंभनि के करिकुंभ जितै कै।गोकुल पानि भुजानि लखे मुख नैनन देत अमी अमितै कै।क्यौं बस होहि न भावती जू मन भाव तो रावरो रूप चितै के॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
पंकज से पानि पाय चंद्रमा सो चारु मुखगोकुलनाथकवितापंकज से पानि पाय चंद्रमा सो चारु मुखगोकुलनाथ२ मिनट का पाठ