नैन भरैं अँसुवानि ढरैं तन कंपत ख़ास बढ़ी निरसै है।सूखि रह्यौ मुख पीरी परी अँग खेद भरी सी छुये तपतैं है।गोकुल छोड़ि भली हौं गई हौ लली अबहीं न गयो पल है है।चैन की कौन करै चरचा सुनि ऐसे ही ग्वाल गँवार जो गैहै॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
दक्षिन में जिन्है देखि लक्षन में देखियतगोकुलनाथकवितादक्षिन में जिन्है देखि लक्षन में देखियतगोकुलनाथ२ मिनट का पाठ