संतो सो अनभै पद गहिये।कल अतीत आदि निधि निरमअ ताकूँ सदा विचारत रहिये॥ टेक॥सो काजी जाकौं काल न ब्यापैं, सो पंडित पद बूझै।सो ब्रह्मा जो ब्रह्म बिचारै, सो जागी जग सूझै॥उदै न अस्त सूर नहीं ससिहर, ताकौ भाव भजन करि लीजै।काया थैं कछु दूरि बिचारै, तास गुरु मन धीजै॥जार्यौ जरै न काट्यो सूकै, उतपति प्रलै न आवै।निराकार अषंउ मंडल मैं, पाँचौ तत्त समावै॥लोचन अचित सबै अँधियारा, बिन लोचन जग सूझै।पड़दा खोलि मिलै हरि ताकूँ, जो या अरथहिं बूझै॥आदि अनंत उभै पख निरमल, द्रिष्टि न देख्या जाई।ज्वाला उठी अकास प्रजल्यौ, सीतल अधिक समाई॥एकनि गंथ बासनाँ प्रगटै जग थैं रहै अकेला॥प्राँन पुरिस काया थैं बिछुरे, राखि लेहु गुर चेला।भाग भर्म भया मन अस्थिर, निद्रा नेह नसाँनाँ॥घट की जोति जगत प्रकास्या, माया सोक बुझाँनाँ।बंकनालि जे संमि करि राखै, तौ आवागमन न होई॥कहैं कबीर धुनि लहरि प्रगटी, सहजी मिलैगा सोई॥157॥

