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हाशिया
कविता
जे बिकार हैं देह कै, देहहि के सिर मारि
सुंदरदास
दोहा · लगभग २ मिनट
जे बिकार हैं देह कै, देहहि के सिर मारि।
सुन्दर याते भिन्न ह्वै, अपनौ रूप बिचारि॥
॥
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पंथी मंहि पंथ चलि, आयौ आकसमात
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साह रमइया अति बड़ा, खोलै नहीं कपाट
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सुंदरदास
कविता
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