चलौ बिचारी रहौ सँभारी, कहता हूँ ज पुकारी।राम नाम अंतर गति नाहीं, तौ जनम जुवा ज्यूँ हारी॥ टेक॥मूँड़ मुड़ाइ फूलि का बैठे, काँननि पहरि मजूसा।बाहरि देह षेह लपटानीं, भीतरि तौ घर मूसा॥गालिब नगरी गाँव बसाया, हाँम काँम हंकारी।घालि रसरिया जब जँम खैंचे, तब का पति रहै तुम्हारी॥छाँड़ि कपूर गाँठि विष बाँध्यौ, मूल हुवा ना लाहा।मेरे राम की अभौ पद नगरी, कहै कबीर जुलाहा॥134॥

