झूठे तन कौ कहा रखइये, मरिये तौ पल भरि रहण न पइये॥ टेक॥षीर षाँढ़ घृत प्यंउ सँवारा, प्राँन गये ले बाहरि जारा॥चोवा चंदन चरनत अंगा, सो तन जरै काठ के संगा॥दास कबीर यहु कीन्ह बिचारा, इक दिन ह्नैहै हाल हमारा॥93॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
हम घर सूत तनहि नित ताना कंठ जनेऊ तुमारेकबीरकविताहम घर सूत तनहि नित ताना कंठ जनेऊ तुमारेकबीर२ मिनट का पाठ
सुरति सिमृति दुई कन्नी मंदा परमिति बाहर खिंथाकबीरकवितासुरति सिमृति दुई कन्नी मंदा परमिति बाहर खिंथाकबीर२ मिनट का पाठ