मन रे तन कागद का पुतला।लागै बूँद बिनसि जाइ छिन में, गरब कर क्या इतना॥ टेक॥माटी खोदहिं भीत उसारैं, अंध कहै घर मेरा॥आवै तलब बाँधि लै चालैं, बहुरि न करिहै फेरा॥खोट कपट करि यहु धन जोर्या, लै धरती मैं गाड्यौ॥रोक्यो घटि साँस नहीं निकसै, ठौर ठौर सब छाड्यौ॥कहै कबीर नट नाटिक थाके, मदला कौन बजावै॥गये पषनियाँ उझरी बाजी, को काहू कै आवै॥92॥

मन रे तन कागद का पुतला
कबीरपद · लगभग २ मिनट