बादल बरसन लागै दोइ।ररौ ममौ उर माहिं उमंगि कै, जल-थल डारे बोइ॥ऊनै आई घटा ज्ञान की, दामनि दमकत सोइ।प्रीति पवन चलि हरि जल बूडी, इम्रत धारा सोइ॥तपति मिटी तन भयौ सीतल, सुरति सुधा रसभोइ।नख-सख नगरी आनंद उपज्यौ, सुख बिलसै सब कोइ॥दुरभक्ष मिटि सुरभष्य उपजानी, दुख दलिद्र गए सोइ।तुरसी आदि अति भई अभैता, मंगल गावै लोइ॥

