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सहज सनेही रामसों तैं कियो न सहज सनेह

पद · लगभग २ मिनट
सहज सनेही रामसों तैं कियो न सहज सनेह।तातें भव-भाजन भयो, सुनु अजहुँ सिखावन एह ॥ १ ॥ज्यों मुख मुकुर बिलोकिये अरु चित न रहै अनुहारि।त्यों सेवतहुँ न आपने, ये मातु-पिता, सुत-नारि ॥ २ ॥दै दै सुमन तिल बासिकै, अरु खरि परिहरि रस लेत।स्वारथ हित भूतल भरे, मन मेचक, तन सेत ॥ ३ ॥करि बीत्यो, अब करतु है करिबे हित मीत अपार।कबहुँ न कोउ रघुबीर सो नेह निबाहनिहार ॥ ४ ॥जासों सब नातों फुरै, तासों न करी पहिचानि।तातें कछू समझ् यो नहीं, कहा लाभ कह हानि ॥ ५ ॥साँचो जान्यो झूठको, झूठे कहँ साँचो जानि।को न गयो, को जात है, को न जैहै करि हितहानि ॥ ६ ॥बेद कह्यो, बुध कहत हैं, अरु हौहुँ कहत हौं टेरि।तुलसी प्रभु साँचो हितू, तू हियकी आँखिन हेरि ॥ ७ ॥

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