संता मानौ दूता डानौ इह कुटवारी मेरी॥दिवस रैन तेरे पाउ पलोसो केस चवर करि फेरी॥हम कूकर तेरे दरबारि। भौकाई आगे बदन पसारि॥पूरब जनम हम तुम्हरे सेवक अब तौ मिट्या न जाई॥तेरे द्वारे धनि सहज की मथै मेरे दगाई॥दागे होहि सुरन महि जूझहि बिनु दागे भगि जाई॥साधू होई सुभ गति पछानै हरि लये खजानै पाई॥कोठरे महि कोठरी परम कोठरी बिचारि॥गुरु दीनी बस्तु कबीर कौ लेवहु वस्तु सम्हारि॥कबीर दोई संसार कौ लीनी जिसु मस्तक भाग॥अमृत रस जिनु पाइया थिरता का सोहाग॥197॥

संता मानौ दूता डानौ इह कुटवारी मेरी
कबीरपद · लगभग २ मिनट