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रामभद्र! मोहिं आपनो सोच है अरु नाहीं

पद · लगभग २ मिनट
रामभद्र! मोहिं आपनो सोच है अरु नाहीं।जीव सकल संतापके भाजन जग माहीं ॥ १ ॥नातो बड़े समर्थ सों इक ओर किधौं हूँ।तोको मोसे अति घने मोको एकै तूँ ॥ २ ॥बड़ी गलानि हिय हानि है सरबग्य गुसाईं।कूर कुसेवक कहत हौं सेवककी नाई ॥ ३ ॥भलो पोच रामको कहैं मोहि सब नरनारी।बिगरे सेवक स्वान ज्यों साहिब-सिर गारी ॥ ४ ॥असमंजस मनको मिटै सो उपाय न सूझै।दीनबंधु! कीजै सोई बनि परै जो बूझै ॥ ५ ॥बिरुदावली बिलोकिये तिन्हमें कोउ हौं हौं।तुलसी प्रभुको परिहर् यो सरनागत सो हौं ॥ ६ ॥

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