हौं रीझी, लखि रीझिहौ, छबिहिं छबीले लालबिहारीकविताहौं रीझी, लखि रीझिहौ, छबिहिं छबीले लाल
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१७८ रचनाएँ

हौं रीझी, लखि रीझिहौ, छबिहिं छबीले लालबिहारीकविता
पर्यौ जौरु बिपरीत रति, रुपी सुरत-रन-धीरबिहारीकविता
तजि तीरथ, हरि-राधिका, तन-दुति करि अनुरागुबिहारीकविता
सोनजुही सी जगमगति, अँग-अँग जोबन-जोतिबिहारीकविता
जम-करि-मुँह तरहरि परयौ, इहिं धरहरि चित लाउबिहारीकविता
वाही की चित चटपटी, धरत अटपटे पाइबिहारीकविता
सरस सुमिल चित-तुरंग की, करि-करि अमित उठानबिहारीकविता
गदराने तन गोरटी, ऐपन-आड़ लिलारबिहारीकविता
नीकी दई अनाकनी, फीकी परि गुहारिबिहारीकविता
लालन, लहि पाऐं दुरै, चोरी सौंह करैं नबिहारीकविता
लाल, अलौकिक लरिकई, लखि-लखि सखी सिहाँतिबिहारीकविता
देह दुलहिया की बढ़े, ज्यौं-ज्यौं जोबन-जोतिबिहारीकविता
पूस-मास सुनि सखिनु पैं, सांईं चलत सवारुबिहारीकविता
बंधु भए का दीन के, को तार्यौ रघुराइबिहारीकविता
मैं तोसौं कैवा कह्यौ, तू जिन इन्है पत्याइबिहारीकविता
जब-जब वै सुधि कीजियै, तब-तब सब सुधि जाँहिबिहारीकविता
जुरे दुहुनु के दृग झमकि, रुके न झीनैं चीरबिहारीकविता
लोभ-लगे हरि-रूप के, करी साँटि जुरि, जाइबिहारीकविता
रससिंगार-मंजनु किये, कंजनु भंजनु दैनबिहारीकविता
लाज-गरब-आलस-उमंग, भरे नैन मुसकातबिहारीकविता
सघन कुंज, घन घन–तिमिरु, अधिक अँधेरी रातिबिहारीकविता
मरकत-भाजन-सलिल-गत, इंदुकला कैं बेखबिहारीकविता
कहि लहि कौनु सकै, दुरी सौनजाइ मैं जाइबिहारीकविता
प्रगट भए द्विजराज-कुल, सुबस बसे ब्रज आइबिहारीकविता
बड़े न हूजै गुननु बिनु, बिरद-बड़ाई पाइबिहारीकविता
बैठि रही अति सघन बन, पैठि सदन-तन माँहबिहारीकविता
बेसरि-मोती-हुति-झलक परी ओठ पर आइबिहारीकविता
कहति न देवर की कुबत, कुल-तिय कलह डरातिबिहारीकविता
थौरें ही गुन रीझते, बिसराई वह बानिबिहारीकविता
लाल, तुम्हारे विरह की अगनि अनूप, अपारबिहारीकविता
सुदुति दुराई दुरति नहिं, प्रगट करति रति-रूपबिहारीकविता
जगतु जनायौ जिहिं सकलु, सो हरि जान्यौं नाँहिबिहारीकविता
जसु अपजसु देखत नहीं, देखत साँवल-गातबिहारीकविता
सब ही त्यौं समुहाति छिनु, चलति सबनु दै पीठिबिहारीकविता
लटकि लटकि लटकतु चलतु, डटतु मुकट की छाँहबिहारीकविता
जौ न जुगति पिय मिलन की, धूरि मुकति-मुँह दीनबिहारीकविता