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धन है न तेरो कोऊ, तन है न तेरो इहाँ

कवित्त · लगभग २ मिनट
धन है न तेरो कोऊ, तन है न तेरो इहाँ,प्रन है न तेरो, बन बैठ्यो गर्व भारी सों।पितु है न तेरो तकि, चित्त है न तेरो फेर,‘मेरो यह मेरो’ बस्यो ही में ज़ोर वारी सों।‘ग्वाल’ कवि मेरो यह तेरो सो अँधेरो भयो,ताहि करि दूर बोध चंद उजियारी सों।नग हैं न तेरे नर, नग हैं न तेरे संग,नग हैं न तेरे, पग क्यों न नगधारी सों॥

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