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हाशिया
कविता
रहिमन बिगरी आदि की, बनै न खरचे दाम
रहीम
दोहा · लगभग २ मिनट
रहिमन बिगरी आदि की, बनै न खरचे दाम।
हरि बाढ़े आकास लौं, तऊ बावनै नाम॥२०३॥
॥
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रहिमन बात अगम्य की, कहन-सुनन की नाहिं
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रहिमन बित्त अधर्म को, जात न लागै बार
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होइ कत कारि बदरिआ, बरखत पाथ
रहीम
कविता
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रहीम
२ मिनट का पाठ
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रहीम
कविता
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रहीम
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इक नाहीं इक पीर, हिय रहीम होती रहै
रहीम
कविता
इक नाहीं इक पीर, हिय रहीम होती रहै
रहीम
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