कबीर यहु मन कत गया, जो मन होता काल्हि।डूंगरि बूठा मेह ज्यूँ, गया, निबांणां चालि॥२२॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
हिंदू तुरक कहाँ ते आये किन एह राह चलाईकबीरकविताहिंदू तुरक कहाँ ते आये किन एह राह चलाईकबीर२ मिनट का पाठ