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कबीर यहु मन कत गया, जो मन होता काल्हि

साखी · लगभग २ मिनट
कबीर यहु मन कत गया, जो मन होता काल्हि।डूंगरि बूठा मेह ज्यूँ, गया, निबांणां चालि॥२२॥

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