इहि बिधि राँम सूँ ल्यौ लाइ।चरन पाषें निरति करि, जिभ्या बिना गुँण गाइ॥ टेक॥जहाँ स्वाँति बूँद न सीप साइर सहजि मोती होइ।उन मोतियन में नीर पीयौ पवन अंबर धोइ॥जहाँ धरनि बरषै गगन भीजै, चंद सूरज मेल।दोइ मिलि तहाँ जुड़न लागे, करता हंसा केलि॥एक बिरष भीतरि नदी चाली, कनक कलस समाइ।पंच सुवटा आइ बैठे, उदै भई बनराइ॥जहाँ बिछट्यो तहाँ लाग्यौ, गगन बैठी जाइ।जन कबीर बटाऊवा, जिनि मारग लियौ चाइ॥280॥

