ताथैं मोहि नाचवौ, न आवै,मेरो मन मंदला न बजावै॥ टेक॥ऊभर था ते सूभर भरिया, त्रिष्णां गागरि फूटी।हरि चिंतत मेरो मंदला भीनौं, भरम भीयन गयौ छूटी॥ब्रह्म अगनि मैं जरी जु ममिता, पाषंड अरु अभिमानाँ।काम चोलना भया पुराना, मोपैं होइ न आना॥जे बहु रूप कीये ते किये, अब बहु रूप न होई।थाकी सौंज संग के बिछुरे, राम नाँम मसि धोई॥जे थे सचल अचल ह्नै थाके, करते बाद बिबाद।कहै कबीर मैं पूरा पाया, भय राम परसाद॥281॥

ताथैं मोहि नाचवौ, न आवै
कबीरपद · लगभग २ मिनट