ऐसा अद्भुत मेरे गुरि कथ्या, मैं रह्या उमेषै।मूसा हसती सौ लड़ै, कोई बिरला पेषै॥ टेक॥उलटि मूसै सापणि गिली, यहु अचिरज भाई।चींटी परबत ऊषण्याँ, ले राख्यौ चौड़ै॥मुर्गी मिनकी सूँ लड़ै, झल पाँणौं दौड़ै।सुरहीं चूँषै बछतलि, बछा दूध उतारै।ऐसा नवल गुँणा भया, सारदूलहि मारै।भील लूक्या बन बीझ मैं ससा सर मारै॥कहै कबीर ताहि गुर करौं, जो या पदहि बिचारै॥161॥

ऐसा अद्भुत मेरे गुरि कथ्या, मैं रह्या उमेषै
कबीरपद · लगभग २ मिनट