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है कोइ जगत गुर ग्याँनी, उलटि बेद बूझै

पद · लगभग २ मिनट
है कोइ जगत गुर ग्याँनी, उलटि बेद बूझै।पाँणीं में अगनि जरैं, अँधरे कौ सूझै॥ टेक॥एकनि ददुरि खाये, पंच भवंगा।गाइ नाहर खायौ, काटि काटि अंगा॥बकरी बिधार खायौ, हरनि खायौ चीता।कागिल गर फाँदियिा, बटेरै बाज जीता॥मसै मँजार खायौ, स्यालि खायौ स्वाँनाँ।आदि कौं आदेश करत, कहैं कबीर ग्याँनाँ॥160॥

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