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पंडित होइ सु पदहि बिचारै, मूरिष नाँहिन बूझै

पद · लगभग २ मिनट
पंडित होइ सु पदहि बिचारै, मूरिष नाँहिन बूझै।बिन हाथनि पाँइन बिन काँननि, बिन लोचन जग सूझै॥ टेक॥बिन मुख खाइ चरन बिनु चालै, बिन जिभ्या गुण गावै।आछै रहै ठौर नहीं छाड़ै, दह दिसिही फिरि आवै॥बिनहीं तालाँ ताल बजावै, बिन मंदल षट ताला।बिनहीं सबद अनाहद बाजै, तहाँ निरतत है गोपाला॥बिनाँ चोलनै बिनाँ कंचुकी, बिनही संग संग होई।दास कबीर औसर भल देख्या, जाँनैगा जस कोई॥159॥

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