सेज रँगीली रँगीली सखीन रीच बहुरंग सुरंग सुहाई।तापर बैठे रँगीले छबीले हँसै रस में सुख की सरसाई॥(स) चिक्कनि अंजन नैन लसै मेहँदी झलकै पद पान रचाई।रूपकी दीपत तें ध्रुव कुंज फनूस सी ह्वै रही यों उर आई॥

सेज रँगीली रँगीली सखीन री
ध्रुवदासकवित्त · लगभग २ मिनट